Saturday, 18 May 2019

बोलने का लहजा सबसे बड़ी ताकत

लाख तुम सुंदरता की मिसाल सही।
पर बोलने का लहजा नहीं, तो तुम किसी काम के नही।
शब्द बर्ह्म है, शब्द अंगार है, शब्द विको क्रीम भी है। 
आज मैं कोई महत्वपूर्ण निर्णय लेने वाला था। सोचा था हालात मेरे निगेटिव ही चलते है। आज भी चलेंगे। लेकिन मेने उनसे जब बात की तो उसमें विनम्रता का रस घोल दिया। अपने शब्दों से बांध दिया। 20 मिनट इंतजार किया, ओर निर्णय मेरे पक्ष में आया। 
शब्दो की ताकत को बड़े ही अच्छे ढंग से जान पाया। 
कुछ भी कहो पर मैं उनकी सॉफ्ट स्किल, बॉडी लैंग्वेज, और आई कॉन्टेक्ट, इफेक्टिव कम्युनिकेशन का बड़ा फैन हूँ।

पत्रकारो की मजबूरियां

अगर आपकी गुड़ इवनिंग रात को 1 बजे होती है तो आप शायद पत्रकार है। #sj_feeling

अगर आप लंच के टाइम चाय, बिस्किट या पोहे खाकर ऑफिस के लिए भाग रहे है तो आप शायद पत्रकार है।
अगर आपके सभी व्हाट्सएप ग्रुप के msg हफ्ते भर से पेंडिंग है और आपको पढ़ने का वक्त नही तो आप शायद पत्रकार है।
अगर आप बाहर का खाना खाने को मजबूर है तो शायद आप पत्रकार है।
अगर आपने सोशल मीडिया पर अपनी अभिव्यक्ति जाहिर करे और कमेंट में आपको 'बिकाऊ' शब्द देखने को मिले तो आप शायद पत्रकार है।
अगर आप अपने कजन की शादी में भी नही पहुंच पा रहे है तो आप शायद पत्रकार है। 
जेहन में युग परिवर्तन की सोच रखते हुए जब महीने की सेलेरी हाथ मे आती है और स्मृति पटल पर ये विचार आता है की खुद की दुनिया भी नही बदल पा रहे है तो आप शायद पत्रकार है।
बाते आप ट्रम्प, पुतिन, मोदी की करेंगे पर आपको GF के साथ डेट में icecream के फ्लेवर के नाम याद नही तो आप शायद पत्रकार है।
अगर आप हर महीने बाइक( कार तो असंभव है) कि सर्विस कराते है तो आप शायद पत्रकार है।
अगर आपके फ़ोन कॉन्टेक्ट में तहसीलदार,हवलदार, चौकीदार, हलवाई के नम्बर है पर अपने रिस्तेदारों के नम्बर दूर तक दिखाई नही दे तो आप शायद पत्रकार है।
अगर आप 1 महीने में जाकर अपनी सेविंग कराते है तो आप शायद पत्रकार है।
अगर आप अपनी पर्सनल छुट्टी के लिए बीमारी का बहाना बनाते है तो आप शायद पत्रकार है।
ओर अगर आप रात को 2 बजे इस तरह की भावुक पोस्ट कर रहे है तो आप पक्का पत्रकार है। 🙄😏 - Jyoti prakash

फेसबुक पोस्ट से गिरते रिस्ते

 सभी फेसबुक के सम्पादक ध्यान दे) 😏 
पहले सब मेरे फ्रेंड थे...#sj_feeling 
सभी विचारधारा वाले लोगो के साथ उठना बैठना था... फिर चढ़ा मुझे अभिव्यक्ति की आजादी का नशा.. ओर मैं फ़ेसबुक पर राजनीतिक पोस्ट करने लगा.. मोदी जी के सपोर्ट में कुछ लिख दूं तो मेरे कोंग्रेसी समर्थक मित्र मुँह फुला लेते। पद्मावत फ़िल्म का समर्थन कर दूं तो राष्ट्रवादी मुझे देशद्रोही करार दे देते। 
कठुआ रेप केस पर कुछ बोलू तो हिंदू नाराज हो जाते।
ओवेसी पर टिप्पणी करु तो मुस्लिम साथी अनफ्रेंड कर देते।
अब जीवन का यथार्थ मालूम हुआ है।( बरगद के पेड़ के नीचे नही यार) की भाड़ में जाये दुनिया, पहले खुद तो सम्पादक बन जाऊं. फिर फेसबुक पर आऊंगा। 😃
मेरे सभी FB संपादक भाईसाहब। ना वामपंथ आपको रोटी देगा, ना मोदी जी। बीवी को फेसबुक की पोस्ट से पॉकेट मनी नही दे सकते। ये आप ओर हम लोग है जो आज के 20 साल बाद भी एक दूसरे की मदद करेंगे। आप फेसबुक पोस्ट से हितों में टकराव कर लेंगे तो घंटा 20 साल तक रिस्ता चलेगा। 20 मिनट नही लगेंगे फुर्र होने में। 🙄🙄
सबकी अलग अलग विचारधारा है। सब अलग परिवेश में जन्म लिए है। मेरा एक बहुत परम मित्र था। अमर उजाला में काम करता है। इतना कि एक थाली में खाना खाते थे। वो सवर्णो के खिलाफ लिखने लगा तो हमने उसकी अपनी लाइफ से छुट्टी कर दी। उसकी संपादकत्व ने हमारे दिल मे नफरत पैदा कर दी। 
ज्यादा हिंदुत्व की पोस्ट, ज्यादा इस्लामपन दिखाना, ज्यादा भक्त बनना, ज्यादा चमचागिरी आपकी खुद की इज्जत ही घटाती है। धन्यवाद।

भारतीय पत्रकारिता की दुर्दशा

भारतीय पत्रकारिता :- 👇 
आज की ही हेडिंग ले लीजिए।
"अलवर में एक दलित युवती के साथ दुष्कर्म।'
यहां मामला कोई सा भी हो, पर 'दलित' शब्द जोड़ना अनिवार्य है। क्योंकि इससे खबरे चलती नही दौड़ती है। उड़ती है। जातिगत निर्णय से चुनाव ही नही जीते जाते बल्कि पत्रकारिता में हेडिंग भी बनाई जाती है। कोई सी भी घटना हो .. नेगेटिव निकले तो खबर चलने वाली है, ओर अगर उसमे दलित से पेच जुड़े है तो सोने पे सुहागा। खोखली होती जा रही है पत्रकारिता। 😏😣
खैर छोड़िये। आगे और सुनिए भारतीय पत्रकारिता की दुर्दशा। 
गाड़ी पर प्रेस लिखवालो, नम्बर की तो जरूरत ही नही है। तीस मार खां है ना। बिना हेलमेट गाड़ी चलाओ, क्योंकि परिवहन के सारे नियम हमारे लिए तो बने ही नही है। पुलिस वाला रोके तो गर्व से कहो -'प्रेस' ! छाती ठोककर कहो - पत्रकार हूँ ' 5-6 बार मे तो वो बोलना छोड़ देगा। क्योंकि लोकतंत्र को हम ही खोखला कर रहे है।
हम ही कर्मचारियों, ओर अधिकारियों से रिश्वत लेते है और दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहते है। 
आजादी से पहले पत्रकारिता मिशन थी। अंग्रेजी हुकूमत को जड़ से उखाड़ फेखने का हथियार थी। और अब विलासिता बन गई। अब हमें पत्रकारिता में ग्लेमर दुनिया नजर आती है। अब हमें व्यवसाय नजर आता है।
इसमे हमारी ही गलती नही, बल्कि आपकी भी है। आपको वही खबरे पसंद आती है, जिनमे मशाला हो। 
कब सुधरेंगे मीडिया संस्थान ।।

एक तेलगु से इस तरह पड़ा पाला

शीट! लेंगेवेज गेप ! इतना भयंकर! की खुद को ही कार्टून मान लिया जाए। 🙄 #sj_feeling
मैं पीता नही। पर आज पीने की इच्छा हुई - दूध। हैदराबाद जैसी मेट्रो सिटी में दूध मिलता है 80 रु. किलो। डेयरी यहां अश्वथामा की तरह गायब है। केवल दुकानदार के पास जाओ 22 रु. लेकर तब तो सस्ता दूध नसीब होगा। चलो छोड़ो। मुद्दे की बात पर आते है।
तो कहां था मैं?? दुकान पर। मैने उससे बोला अंकल हाफ लीटर दूध चाहिए। अंकल तेलगु भाषी थे। जैसे तैसे बेचारे ने 50 शब्द हिंदी के सीखे थे, ताकि कोई राजस्थानी या बिहारी भी यहां आकर उसका धंधा चौपट ना कर दे। अंकल ने बड़े ही हिटलर अंदाज में मुझसे पूछा दूध चाहिए या मिल्क 🙄🙄 
हद हो गई। हमारे यहां तो दूध और मिल्क दोनों एक ही होते है। 2 अलग अलग भाषाओं के समानार्थी शब्द है। 
मेरी स्थिति उस वक्त ऐसी थी जो जम्मू और कश्मीर दोनों को एक समझता है। और दुकानदार बार बार यही पूछ रहा की मिल्क लाऊं या दूध। मुझे लगा कि मिल्क शायद छोटे दूध के पाउच को बोलते है। मेने कहा अंकल आप दोनों ले आओ। मैं सेलेक्ट कर लूंगा मुझे क्या लेना है।
अंकल हाफ लीटर का दूध ले आया। उसपे लिखा तो मिल्क था अंकल ने मुझे डाउट में डाल दिया। मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया कि मिल्क मतलब क्या होता है। दूध या कुछ और। मैने 22 रु. चुकाए ओर घर की तरफ मुड़ गया। यकीन मानो मेरा दिमाग बार बार यही कह रहा था कि अंकल ने मिल्क ओर दूध की व्याख्या तो करनी ही चाहिए। मैं वापस अंकल के पास गया। और उससे पूछा कि अंकल ये मिल्क है तो दूध क्या है। 
अंकल ने अपनी टूटी फूटी हिंदी में हंसते हुए बोला। सोरी बेटा हम कंफ्यूज हो गए थे. हम छाछ को दूध समझ कर बोल रहे थे 😓😓🙏🙏😃😃 
वैसे बता दूं तेलगु में दूध को पालू बोलते है। कोई दूध शब्द का इस्तेमाल ही नही करता। वैसे अंकल हिंदी में नए थे। पर एक हिंदी भाषी को ये सोचने पर मजबूर कर दिया कि दूध और मिल्क क्या अलग अलग होते है 🙄😏

माँ ! एक शब्द में पूरा ब्रमांड

उसको कुछ बताने कि जरूरत नहीं, वो आपकी आंखे पढ़ेगी और पहचान जाएगी कि क्या चल रहा है आपकी लाइफ में. 
मैं जब भी घर जाता हुं तो वो मेरे पंसद का खाना बनाती है चाहे घर में उस खाने को कोई पंसद करे या ना करें.
वो एक ही है जो फोन कर पूछती है कि कुछ खाया कि नहीं खाया. 
ज्यादा मोबाइल पर चिपका रहुं तो वो कहती है - आग लगा दुंगी इस मोबाइल को..दिनभर चिपका रहता है.
जब कुछ गुस्ताखी हो जाए हमसे तो वो कहती है - अपने बोरियां बिस्तर समेट और निकल जा घर से, देखती हुं कौन रोटी देता है. और फिर पूरे दिन भर रोती रहती है. उसकी ये डांट भी अब बहुत सताती है.
वो बचपन में काला टीका लगाती थी, ताकी नजर ना लगे.
वो अपनी टूटी-फुटी इंग्लिस के बदौलत पूरे घर को हंसाती है. 
शब्द नहीं है कि उसके लिए कुछ लिख सकूं.. वो मेरा आदर्श है, प्रेरणा है, ताकत है. सारी दुनियां देख ली, लेकिन जो सुकुन तेरे पल्लू में है, वो कहीं नहीं. मेरा घर स्वर्ग है. भगवान से प्रार्थना है मुझे अगले जन्म फिर यहीं आंगन मिले. यहीं कोख मिले. यहीं मां मिले. और आप सदा खुश रहे. 
सीधा हुं, सादा हुं, मैं उसके लिए अच्छा हुं.
मैे कितना भी बड़ा हो जाउं मां, मैं अभी तुम्हारे लिए बच्चा हुं.

नाथूराम गोडसे। राष्ट्रभक्त या देशद्रोही।

यहां अफजल की बरसी मनाने पर फ्रीडम ऑफ स्पीच कहलाती है। 
यहां आतंकियों के लिए देर रात 3 बजे सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे खोले जाते है। 
यहां पाकिस्तान जिंदाबाद अभिव्यक्ति की आजादी में आता है।
यहां हिन्दू भगवानो को गालियां निकाली जाती है।
ये सब कार्य सही है। लेकिन गोडसे को देशभक्त कहना गलत है। 
जिसकी रगों में हिंदुस्तान की आजादी बहती थी वो देशभक्त नही है??? माना बापू की हत्या उसका महा अपराध है। इसके लिए उन्हें माफ नही किया जाना चाहिए, लेकिन उसके भी अपने तर्क थे कि बापू ने विभाजन रोकने की कोशिश नही की। विभाजन के लिए ना अनसन किया, ना कोई सत्याग्रह। जबकि बापू ने कहा था कि विभाजन उनके मृत शरीर के बाद ही संभव है। 
राष्ट्रपिता की हत्या करने पर उसकी ये पदवी छीन ली जाए??
रावण ने भी सीता हरण किया था पर आज भी वो विद्वान कहलाता है। शिव तांडव के रचयिता रावण ही कहलाता है।
गोडसे राष्ट्रभक्त ही था, शायद इसलिए गांधी जी ने मरते मरते उसको सजा न देने की अंतिम इच्छा जाहिर की थी। ये मेरी निजी राय है। बाकी सबकी अपनी अलग विचारधारा।
और हां। इस लेख से मैं कोई हत्या को प्रोत्साहित नही कर रहा। देशभक्त ओर देशद्रोही को इंगित कर रही है ये पोस्ट। हत्या गलत है। चाहे जो भी तर्क हो।