Saturday, 18 May 2019

किसी को कॉपी मत करो

तुम जैसे हो वैसे ही रहो। किसी को भी कॉपी मत करो। #jyoti_diary
जरूरी नही 10 के 10 लोग तुम्हे पसंद करें, 10 में से 3 करेंगे लेकिन वो 3 तुमको समझने वाले होंगे। वो झूठा ओर नकली दिखावटी चाहत नही दिखाएंगे। वो 3 तुम्हारे अपने होंगे। 
अगली बार अगर कोई तुमसे ये कहे कि मेरा व्यवहार ज्यादा है तुम्हारा कम है, तो उसको बोलना की इस नकली ओर स्वार्थी दुनिया मे व्यवहार रुतबे से बनता है। जिस दिन रुतबा खत्म, तुम व्यवहार शब्द का उच्चारण भी बंद कर दोगे। ओर व्यवहार नही, दिल मिलना चाहिए। कोई 1 का नाम बतादो जो विपरीत परिस्थितियों में तुम्हारे साथ खड़ा हो सके।

इसलिए तुम जैसे हो वैसे रहो। कॉपी मत करो। ओरिजिनल बने रहो। क्योंकि ओरिजिनल की कीमत डुप्लीकेट से ज्यादा होती है।

धारा 124 A

124(A) अंग्रेजो की देन है। ताकि कोई भी आजादी का दीवाना अगर ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ आवाज उठाये तो उस पर देशद्रोह का मुकदमा चला दिया जाता था, जिसकी सजा होती थी - ' मौत' 
आजादी के 70 साल बाद इस धारा का कोई मतलब नही रह जाता। सरकार के खिलाफ बोलना देशद्रोह नही होता। 124 A को खत्म करने का सीधा मतलब होगा आप सरकार के अन्याय के विरोध में बोल सकते है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में इस धारा को बनाये रखना भारत पर शोभा नही देता। राजनाथ सिंह भी एक बार इसको हटाने की सिफारिश कर चुके है। अब ये कोंग्रेस के मेनिफेस्टो में शामिल हुआ है।

दक्षिणपंथी दक्षिण के लोग

दक्षिण के लोग 100 फीसदी दक्षिणपंथी होते है। यहां कदम कदम पर भारतीय संस्कृति देखने को मिलती है। यहां नवरात्रि में हर घर के बाहर की सड़के रंगोली से पीली हो जाती है। आज की ही बात बताऊं।
मैं मकान मालिक के पास गया ओर बोला ' अंकल रोज रोज की पानी नही आता है। मैं रूम खाली कर रहा हूँ। नहाना तो दूर पीने का पानी भी नही है।'
उसने हामी भर दी
जब मैं रूम खाली कर रहा था, तो उसने पूछा कि खाना खाया ??
मैं उनकी तरफ टेडी नजरो से देखने लगा। ऐसे लड़कर रूम खाली करने पर हमारे जयपुर में जूते पड़ते है। यहां फूल बरस रहे है। यकीन नही करोगे की दोनों पति पत्नी ने बड़े प्यार से मुझे बैठाकर खाना खिलाया। वो नही चाहते थे कि इन पावन 9 दिनों में कोई भूखा पेट घर छोड़कर जाए। वो नही चाहते थे कि किसी की आत्मा उनकी वजह से hurt हो।
उगादि ( दक्षिण में भारतीय नववर्ष) का त्योहार दक्षिण में ही मनाया जाता है। मैं खुश हूं कि मैं 1 दिन का इस संस्कृति का हिस्सा बना।

बोलने का लहजा सबसे बड़ी ताकत

लाख तुम सुंदरता की मिसाल सही।
पर बोलने का लहजा नहीं, तो तुम किसी काम के नही।
शब्द बर्ह्म है, शब्द अंगार है, शब्द विको क्रीम भी है। 
आज मैं कोई महत्वपूर्ण निर्णय लेने वाला था। सोचा था हालात मेरे निगेटिव ही चलते है। आज भी चलेंगे। लेकिन मेने उनसे जब बात की तो उसमें विनम्रता का रस घोल दिया। अपने शब्दों से बांध दिया। 20 मिनट इंतजार किया, ओर निर्णय मेरे पक्ष में आया। 
शब्दो की ताकत को बड़े ही अच्छे ढंग से जान पाया। 
कुछ भी कहो पर मैं उनकी सॉफ्ट स्किल, बॉडी लैंग्वेज, और आई कॉन्टेक्ट, इफेक्टिव कम्युनिकेशन का बड़ा फैन हूँ।

पत्रकारो की मजबूरियां

अगर आपकी गुड़ इवनिंग रात को 1 बजे होती है तो आप शायद पत्रकार है। #sj_feeling

अगर आप लंच के टाइम चाय, बिस्किट या पोहे खाकर ऑफिस के लिए भाग रहे है तो आप शायद पत्रकार है।
अगर आपके सभी व्हाट्सएप ग्रुप के msg हफ्ते भर से पेंडिंग है और आपको पढ़ने का वक्त नही तो आप शायद पत्रकार है।
अगर आप बाहर का खाना खाने को मजबूर है तो शायद आप पत्रकार है।
अगर आपने सोशल मीडिया पर अपनी अभिव्यक्ति जाहिर करे और कमेंट में आपको 'बिकाऊ' शब्द देखने को मिले तो आप शायद पत्रकार है।
अगर आप अपने कजन की शादी में भी नही पहुंच पा रहे है तो आप शायद पत्रकार है। 
जेहन में युग परिवर्तन की सोच रखते हुए जब महीने की सेलेरी हाथ मे आती है और स्मृति पटल पर ये विचार आता है की खुद की दुनिया भी नही बदल पा रहे है तो आप शायद पत्रकार है।
बाते आप ट्रम्प, पुतिन, मोदी की करेंगे पर आपको GF के साथ डेट में icecream के फ्लेवर के नाम याद नही तो आप शायद पत्रकार है।
अगर आप हर महीने बाइक( कार तो असंभव है) कि सर्विस कराते है तो आप शायद पत्रकार है।
अगर आपके फ़ोन कॉन्टेक्ट में तहसीलदार,हवलदार, चौकीदार, हलवाई के नम्बर है पर अपने रिस्तेदारों के नम्बर दूर तक दिखाई नही दे तो आप शायद पत्रकार है।
अगर आप 1 महीने में जाकर अपनी सेविंग कराते है तो आप शायद पत्रकार है।
अगर आप अपनी पर्सनल छुट्टी के लिए बीमारी का बहाना बनाते है तो आप शायद पत्रकार है।
ओर अगर आप रात को 2 बजे इस तरह की भावुक पोस्ट कर रहे है तो आप पक्का पत्रकार है। 🙄😏 - Jyoti prakash

फेसबुक पोस्ट से गिरते रिस्ते

 सभी फेसबुक के सम्पादक ध्यान दे) 😏 
पहले सब मेरे फ्रेंड थे...#sj_feeling 
सभी विचारधारा वाले लोगो के साथ उठना बैठना था... फिर चढ़ा मुझे अभिव्यक्ति की आजादी का नशा.. ओर मैं फ़ेसबुक पर राजनीतिक पोस्ट करने लगा.. मोदी जी के सपोर्ट में कुछ लिख दूं तो मेरे कोंग्रेसी समर्थक मित्र मुँह फुला लेते। पद्मावत फ़िल्म का समर्थन कर दूं तो राष्ट्रवादी मुझे देशद्रोही करार दे देते। 
कठुआ रेप केस पर कुछ बोलू तो हिंदू नाराज हो जाते।
ओवेसी पर टिप्पणी करु तो मुस्लिम साथी अनफ्रेंड कर देते।
अब जीवन का यथार्थ मालूम हुआ है।( बरगद के पेड़ के नीचे नही यार) की भाड़ में जाये दुनिया, पहले खुद तो सम्पादक बन जाऊं. फिर फेसबुक पर आऊंगा। 😃
मेरे सभी FB संपादक भाईसाहब। ना वामपंथ आपको रोटी देगा, ना मोदी जी। बीवी को फेसबुक की पोस्ट से पॉकेट मनी नही दे सकते। ये आप ओर हम लोग है जो आज के 20 साल बाद भी एक दूसरे की मदद करेंगे। आप फेसबुक पोस्ट से हितों में टकराव कर लेंगे तो घंटा 20 साल तक रिस्ता चलेगा। 20 मिनट नही लगेंगे फुर्र होने में। 🙄🙄
सबकी अलग अलग विचारधारा है। सब अलग परिवेश में जन्म लिए है। मेरा एक बहुत परम मित्र था। अमर उजाला में काम करता है। इतना कि एक थाली में खाना खाते थे। वो सवर्णो के खिलाफ लिखने लगा तो हमने उसकी अपनी लाइफ से छुट्टी कर दी। उसकी संपादकत्व ने हमारे दिल मे नफरत पैदा कर दी। 
ज्यादा हिंदुत्व की पोस्ट, ज्यादा इस्लामपन दिखाना, ज्यादा भक्त बनना, ज्यादा चमचागिरी आपकी खुद की इज्जत ही घटाती है। धन्यवाद।

भारतीय पत्रकारिता की दुर्दशा

भारतीय पत्रकारिता :- 👇 
आज की ही हेडिंग ले लीजिए।
"अलवर में एक दलित युवती के साथ दुष्कर्म।'
यहां मामला कोई सा भी हो, पर 'दलित' शब्द जोड़ना अनिवार्य है। क्योंकि इससे खबरे चलती नही दौड़ती है। उड़ती है। जातिगत निर्णय से चुनाव ही नही जीते जाते बल्कि पत्रकारिता में हेडिंग भी बनाई जाती है। कोई सी भी घटना हो .. नेगेटिव निकले तो खबर चलने वाली है, ओर अगर उसमे दलित से पेच जुड़े है तो सोने पे सुहागा। खोखली होती जा रही है पत्रकारिता। 😏😣
खैर छोड़िये। आगे और सुनिए भारतीय पत्रकारिता की दुर्दशा। 
गाड़ी पर प्रेस लिखवालो, नम्बर की तो जरूरत ही नही है। तीस मार खां है ना। बिना हेलमेट गाड़ी चलाओ, क्योंकि परिवहन के सारे नियम हमारे लिए तो बने ही नही है। पुलिस वाला रोके तो गर्व से कहो -'प्रेस' ! छाती ठोककर कहो - पत्रकार हूँ ' 5-6 बार मे तो वो बोलना छोड़ देगा। क्योंकि लोकतंत्र को हम ही खोखला कर रहे है।
हम ही कर्मचारियों, ओर अधिकारियों से रिश्वत लेते है और दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहते है। 
आजादी से पहले पत्रकारिता मिशन थी। अंग्रेजी हुकूमत को जड़ से उखाड़ फेखने का हथियार थी। और अब विलासिता बन गई। अब हमें पत्रकारिता में ग्लेमर दुनिया नजर आती है। अब हमें व्यवसाय नजर आता है।
इसमे हमारी ही गलती नही, बल्कि आपकी भी है। आपको वही खबरे पसंद आती है, जिनमे मशाला हो। 
कब सुधरेंगे मीडिया संस्थान ।।