कितनी सेलेरी है तुमारी??'
' हप्पप्प ! लड़कों से सेलेरी नहीं पूछते'
' ठीक है मत बता। मुझे कोनसा देगा तू'
' इत्ता काहे का गुस्सा। बता रहा हूँ ना। **+ है।'
' ok तो सेविंग कितनी होती है'
' बहुत कम'
अगली वाली पंक्ति जो उसने बोली उसमें मैं सोचने पर मजबूर हो गया।
" सेलेरी क्या है ये इम्पोर्टेन्ट नहीं है। इम्पोर्टेन्ट है तुम सेव कितना कर रहे हो'
इस लाइन ने दिल जीत लिया। #sj_feeling
जब 5000 कमाते थे तब भी संतुष्ट थे, 1 लाख कमाएंगे तो भी संतुष्ट नहीं हो पाएंगे। सब चाहत का खेल है। महत्वकांक्षी दिल है ना, मानता ही नहीं।
जो 10 हजार कमाते है वो भी सेविंग कर लिया करते है। बच्चों की अच्छी शादी करवाया करते है। हम उनसे ढाई गुना कमा रहे है तो भी 'सेविंग' शब्द से अछूते है।
कृपा कहाँ अटकी है पता है??
ग्लेमर लाइफ पर। मध्यम वर्ग की सैलरी उठा कर रईसों वाले शौक ही हमारी सेलरी का बंटाधार करते हैं। मेरी पुराने ऑफिस की एक साथी थी। सेलेरी 16 हजार थी। 4 हजार पापा से मंगवाती थी। तब जाकर उसका एक महीना निकलता था। कैसे-
● बात बात पर Swiggy .... Wt a delivery 😀 .. घर पर आटा गूंथने में जोर आता है।
● गली के दूसरे छोर के लिए भी Ola cab. फिर बोलते है मोटी हो रही हूं या हो रहा हूँ। पैसे खर्च हो रहे है, चर्बी बढ़ रही है।
● हर दूसरे दिन अपने दोस्तों के साथ रेस्टॉरेंट का खाना। 400 रुपये मिनिमिम होता है।
● हर हफ्ते शॉपिंग। एक ड्रेस हफ्ते में दूसरी बार पहन लो तो कोनसा पहाड़ टूट पड़ेगा भई।
● ब्रांड की तरफ भागना। 100 रुपये वाली इयरफोन भी तो वहीं आवाज देगी। बोट रोकर्स खरीदना जरूरी है क्या।
● हर 10 दिन में मूवी।
● सिगरेट, वाइन अगर ये एक्स्ट्रा होते है तो।
सेविंग हम कर सकते है। बड़े आराम से। लेकिन अपने जीवन को सुलभ बनाने वाली भौतिक वस्तुओं और शौकिया जीवन के लिए हम नहीं कर पाते। और आखिरकार हर दूसरे व्यक्ति की तरह हमारी सेलेरी भी पहले 10 दिन में ही खत्म हो जाती है।
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